डांग की घटनाओं की वास्तविकता

26 दिसंबर 1998 से गुजरात राज्य का डांग जिला समाचार पत्रों की सुर्खियों में रहा है। इन घटनाओं की पृष्ठभूमि और इसके मूल कारणों से सर्व सामान्य लोग आज भी अधिक परिचित नही है।

जिले मे कुल आबादी 1.50 लाख है,जिसमे से 95 प्रतिशत वनवासी है। दक्षिण गुजरात में महाराष्ट्र राज्य की सीमा से लगता हुआ यह जिला 312 गांवो का है। आजादी के समय इस जिले में 500 ईसाई थे जो आज बढकर 40 हजार हो गये है। धर्मान्तरणकी यह तुफानी गति गत दो दशको मे विशेष रूप से बढी है। इसके कारण अनेकों पारिवारिक समस्याएं खडी हुई है। सांस्कृतिक पहचान का संकट ख़डा हुआ है।

ये घटनाए इन्ही सब कारणो का परिणाम है। पौराणिक दंडकारण्य के नाम से प्रसिध्द इस क्षेत्र में भील जनदाति बहुसंख्या में है। रामायण का शबरी प्रेम प्रसंग भी इसी क्षेत्र से जुडा हुआ है। शबरी यहीं हुई थी,ऐसा यंहा के लोगो का विश्वास है। इसीलिये राम,हनुमान,शबरी के लिये इस क्षेत्र के लोगो में बहुत श्रध्दा है। कोकणा और वारली जनजाति के लोग भी इस क्षेत्र में है, जिनकी शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति भीलों की तुलना में अच्छी है। तुलनात्मक रूप से भील समुदाय का धर्मान्तरण अधिक मात्रा में हुआ है।

सरकारी अभिलेंखो का अनुसार जिले मे केवल एक चर्च जिला मुख्यालय में आहवा AHWA में है, जो कॅथोलिक समुदाय को चर्चेज आफ नार्थ इंडिया (सी.एन.आई.) के नाम से है। परन्तु जिले मे 133 गावों में चर्च (प्रार्थना गृह) होने का दावा ईसाई संगठन करते है, जबकि प्राप्त जानकारी के अनुसार इन अनाधिकृत प्रार्थना गृहों की संख्या 153 है।इनमे से 43 प्रार्थना गृह एक अकेले सरकारी अधिकारी वी.डी.अंसारी(RDC) के कार्यकाल में गत 10 वर्षों में चर्च संगठन, उक्त अधिकारी एवं धर्मान्तरित वनवासियों की सांठगांठ से अनाधिकृत रूप से बनाये गये है।इस अधिकारी नें 43 लोगो को इतने ही गावों में सरकारी भूमि आबंटित की और इन लोगो ने प्रार्थना गृह खडे कर लिए। चिंचौड के अनिल भाई नवली ने बताया कि हमारे गांव में मोतीराम भाई राउत (जो एक शिक्षक थे-नाम की तरफ ध्यान न दें,ये ईसाई हैं परन्तु धर्म बदलने के बाद भी नाम नहीं बदला) नें अपने घर के पास हाल में ही आबंटित सरकारी भूमि पर एक मकान बनाना शुरू किया, पूछने पर बताया कि पशुओं को बांधने का बाड़ा बना रहे हैं।मकान पूरा हो जाने पर उस पर एक दिन उक्त अधिकारी को बुलाया गया और उसकी व फादर की उपस्थिति में मकान पर क्रास लगाकर उसे प्रार्थना गृह बना दिया, जिसका हम लोग डर के कारण विरोध भी न कर सके।

पूर्ववर्ती घटनाएं

दिनांक 4.11.98- निरगुणमाल के हनुमान मंदिर पर तोड़-फोड़ की, विष्ठा-पेशाब से मूर्ति अपवित्र की ।
वर्ष 1997 में गाढ़वी के मंदिर की हनुमानजी की मूर्ति के तीन तुकड़े कर दिये गये ।
दिनांक 11.11.98- दगुनिया गांव में मूर्ति स्थापना के अवसर पर निकली हिन्दुओं की शोभाय़ात्रा पर हमला। आरोपी शिवा भाई जी.मुकुन्दकर(पूर्व सरपंच),उसकी पत्नी रमीबेन एवं अन्य 8-10 लोग सभी ईसाई थे।

दिनांक 15.11.98- आहवा में हिन्दु संतों और उनके वाहनों पर पथराव-दक्षिण गुजरात के साधुसमाज के प्रमुख पू.स्वामी रामदेवदास जी महाराज, पू.स्वामी रामविलास जी महाराज एवं ठाकोरदास जी महाराज दिनांक 4.11.98 को निरगुणमाल के हनुमान मंदिर पर हुई तोड़-फोड़ की जानकारी मिलने पर वास्तविकता देखकर लौट रहे थे। तब दिन-दहाड़े जिला मुख्यालय आहवा में यह घटना हुई।

दिनांक 25.12.98 - डांग के मुख्यालय आहवा में हिन्दू जागरण मंच द्वारा आयोजित धर्म सभा पर चर्च से एकत्र निकल कर योजनापूर्वक हमला । इस धर्म सभा में संतराम मंदिर के पू. स्वामी रामदास जी महाराज, पू. स्वामी असीमानंद जी महाराज और अन्य साधु संत और 5-7 हजार वनवासी शांतिपूर्वक, हिन्दू धर्म की आज की स्थिति और धर्मान्तरण के कारण समाज में हो रहे बिखराव पर चर्चा कर रहे थे। बजरंग दल डांग के संजय व्यवहारे को 23.7.98 को एक पोस्टकार्ड द्वारा भविष्य में कोई रैली या सभा न करने और करने पर गंभीर परिणामों को भुगतने के लिये तैयार रहने की धमकी भी दी गई थी, इससे भी साफ हो जाता है कि यह हमला सोची समझी योजना के अंतर्गत किया गया था।
धर्म सभा पर पथराव के बाद संजय व्यवहारे के घर पर भी हमला किया गया और उसके घर के बाहर खड़ी जीप एवं मोटर साईकल की भी तोड़-फोड़ कर कुल 50 हजार रुपये का नुकसान पहुंचाया गया।

उसी रात को वांकी (गलकुन्ड) के सरपंच दिनकरभाई की गोली बारी से पांच वनवासी घायल हुए। इस ईसाई कांग्रेसी सरपंच ने भय और आतंक फैलाने के लिए बिना किसी उत्तेजना के सहसा फायरिंग कर दी और बाद में आत्मरक्षा के लिये गोली चलाने की बात कही।

उपरोक्त पृष्ठ भूमि में डांग में 25 दिसम्बर को हुई घटनाओं को देखना चाहिये। इस दिन चर्च के द्वारा बड़े पैमाने पर स्थानीय वनवासियों को ईसाई बनाया जाता है या बनाने की दिशा में प्रभावित किया जाता है।
इसी दिन (25 दिसंबर को) डांग के आस-पास लगे पांच स्थानों पर भी हिन्दू सम्मेलन हुये थे, परंतु अन्य कही भी हिंसक घटनायें नहीं हुई।

वनवासियों के मन अशांति एवं आक्रोश के कारण एवं उसमें चर्च की भूमिका -

1. पारिवारिक कलह पैदा करना - परिवार में पिता हिन्दू है, एक बेटा ईसाई, दूसरा हिन्दू है। पिताजी की मृत्यु पर दोनों बेटों में झगडा होता है, एक हिन्दू रीति से अंतिम संस्कार करने की सोचता है तो दूसरा ईसाई रीति से। ऐसे अवसरों पर चर्च और उससे जड़े लोग भी परिवार के ईसाई सदस्य को हिन्दू सदस्य की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार में जाने से रोकते है, वे कहते हैं कि वह तो हिन्दू था उसका अंतिम संस्कार तो हिन्दू रीति से होगा, तुमको नहीं जाना चहिये। इस प्रकार रक्त संबंधों में भी दरार डालते है।

इसके लिये चर्च के लोग बाइबल का उदाहरण देकर बोलते है कि यह तो होने वाला है, स्वयं यीशु मसीह यह बोलकर गये है - ‘’ क्या तुम सोचते हो मैं पृथ्वी पर शांति करने आया हूँ, नही बल्कि इसके विपरीत फूट डालने आया हूँ। एक घर में पांच में फूट पड़ेगी, तीन दो के सामने होंगे, दो तीन के सामने। बाप बेटे के विरुध्द होगा, बेटा बाप के। भाई भाई के सामने होगा, माँ बेटी के सामने होगी, बेटी माँ के सामने।

(बाईबिल लूक 12/49 से 53, मेथ्यू 10/34,35,56)
जूना करार के पुनर्नियम 12/2,3 एवं 13/7 से 10 भी देखें।

2. डांग जिला आज भी सघन जंगल से घिरा है। महालकोट जैसे क्षेत्र में दोपहर में भी सूर्य की किरणे धरती तक नहीं पहुँच पाती। दिन में भी आप यहाँ बाघ देवता के दर्शन कर सकते है। बाघ, अजगर, नाग, तेंदूआ और रीछ जैसे जंगली जानवर आज भी खुले घूमते मिल जाते है।
प्रत्येक गांव के बाहर देवता का निश्चित स्थान होता है जहां वर्ष में एक बार प्रतीक रुप से बाघ की पूजा की जाती है और गांव के सभी लोग उससे प्रार्थना करते है कि हमारे गांव पर कृपा दृष्टि रखें।

डुंगरदेव, वाघ देव और नाव देव की पूजा के लिये प्रति वर्ष गांव का एक सामूहिक कार्यक्रम होता है जिसमें गांव के सभी लोग परम्परागत रूप से भाग लेते हैं । परन्तु धर्मान्तरण के कारण जैसे जैसे ईसाई वनवासियों की संख्या बढ़ती जारही है वैसे वैसे चर्च के निर्देश पर इन त्योहारों पर ‘’फाला'’(10-15 रू.) देने में ईसाई वनवासी आना कानी करते हैं । जिसके कारण गांव की संपूर्ण सामूदायिक एवं सांस्कृतिक सौहार्द्रता के ताने बाने पर विपरीत असर होता है ।

इसके बारे में डांग जिले से लगे नवसारी जिले के पुलिस अधिक्षकश्री अमर सिंग बसावा (जो कि डांग जिले की घटना के समय यहां की शांति व्यस्था के लिये विशेष रूप से लगाये गये थे और स्वयं भी वनवासी है ।) ने भी अपने एक साक्षात्कार में इसे स्वीकार किया है ।

(दैनिक घबकार, सूरत दिनांक 8/1/99)

3. ईसाईकरण के कारण शादी विवाह के समय परिवार की बहू बेटीयां जब पादरी या चर्च से जुड़े अन्य परिचित व्यक्तियों से हाथ मिलाती हैं व परम्परागत शिष्टाचार या पांव छूने की अभिवादन की पध्दत्ति का पालन नहीं करती तो इसके बारे में भी गांव के बड़े बूढ़ों में प्रतिक्रिया होती है परन्तु लाचारीवश कुछ न कर सकने की कुंठा भी जन्म लेती है ।

गौडंलविहार गांव के गोंडबाजार इलाके में डांग की घटनाएं होने के बाद भी 14/1/99 को इस क्षेत्र के आराध्य देव हनुमानजी को बंदर, शिवजी को भूत और भगवान राम को शिकारी कह कर हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करने और लोगों को उकसाने का कार्य हुआ जिसकी पुलिस में नामजद रिपोर्ट लिखायी गई ।

4. सूरत जिले के तत्कालीन कलेक्टर श्री आर.एम. शाह और पुलिस अधिक्षक श्री वाघेला जब जिले की व्यारा तहसील के गांव दडकवाण में कल दौरे पर गये तो उन्हें पता लगा कि वहां रहने वाली एक वनवासी महिला की मृत्यु हो गयी तो उसके दो ईसाई बेटों ने अपनी हिन्दू माँ को ईसाई पध्दति से दफना दिया और बाकी दोन हिन्दू बेटों को इसका पता भी नहीं लग सका, वे अंतिम दर्शन भी न कर सके।

उसी गांव में उन्होंने पाया कि पंचायत की जमीन पर एक चर्च पहले से बना हुआ है, बाजू में दूसरा और बन रहा है । उन्होंने तुरत्न अवैध कब्जा हटाकर वहां एस.आर.पी. (पुलिस) कैम्प के लिये इस भवन को उपयोग के लिये दिया।

(दैनिक संदेश सूरत 1/1/99)

धर्मान्तरण कैसे कैसे !

1. मानविहिर की शातू बेन गुलाब भाई पवार बतातीं है कि असका पति गुलाब भाई बिमार रहता था। दवाई आदि कराई पर कोई लाभ नहीं हुआ। गांव के पास्टर के कहने पर कि ख्रिस्ती बनने पर ठीक हो जायेगा, गुलाब भाई ने अपना धर्म बदल लिया। असके बावजूद भी उसका स्वास्थ ठीक नहीं हुआ तो पास्टर ने कहा कि शीतू बेन अभी भी भूत, बंदरों की पूजा करती है, वह भी ईसाई हो जायेगी तो ठीक हो जाओगे। शीतू बेन और बाद में उसका पूरा परिवार ईसाई हो गया परन्तु गुलाब भाई ठिक होने की बजाए मर गया ।

अब शीतू बेन और उसका पूरा परिवार वास्तविकता को समझ गया है और उनई माता के कुंड में स्नान कर पुन: हिन्दू हो गया है ।

2. जामनविहिर की ही अरूणा चंदू पवार आज से दो वर्ष पूर्व जब 7 साल की थी तो आने गांव में बपतिस्मा क्या होता है - यह तमाशा देखने गयी थी । पादरी ने इस नाबालिग लड़की को भी बपतिस्मा का पानी दे दिया । यह ध्यान रहे कि नाबालिग व्यक्ति का धर्म बदलना कानूनन अपराध है ।

3. धांगड़ी फादर पाड़ा के सुरेश ने बताया कि उसके पेट में हर समय दर्द रहता था। चर्च वाले पास्टर ने कहा कि तुन ख्रिस्ती बन जाओगे तो मैं तुम्हारे लिये प्रार्थना करूंगा और उसने धर्म बदल लिया ।

4. वाकीगांव (गलकुंड आहवा जिला डांग के पास) का मधुगवली बांसदा की सुमित्रा बेन पटेल के साथ बिना विवाह किये रहने लग गया । जब सुमित्राबेन गर्भवती हो गयी तो मधु ने उसे ईसाई बनने की शर्त पर विवाह कर ब्लेकमेल करना चाहा, जिस पर बांसदा में हंगामा हो गया ।

(दैनिक धबकार दिनांक 3/1/99)

5. दिनांक 3/1/99 को सूरत जिला के तालुका सोनगढ़ के राशमाटी गांव में रमेशभाई माकड़ियाभाई गामित जो कि खेतों में मजदूरी करता है, को लीमजीभाई छीड़ीयाभाई गांमित (पास्टर) रमेशभाई गामित और पांच अन्य लोंगो ने रास्ते चलते मारा पीटा, फिर चर्च में ले जा कर खंभे से बांध दिया और रात भर इसलिये पीटते रहे क्योंकि वह ईसाई बनने को तैयार नहीं हो रहा था ।

रड़तियाभाई बुधियाभाई पवार ने उसे अगले दिन खोल कर छोड़ा । मामले की 7 जनवरी को सोनगढ़ थाने में नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गयी ।

(दैनिक संदेश सूरत 7/1/99)

6. उधना डिंडोलीरोड़ पर सीतारामनगर सोसायटी सूरत के प्लाट नं. 11 मे मूल उत्तरप्रदेश की रहने वाली उर्मिलाबेन लौजारी विश्वकर्मा नामक एक महिला रहती है, उसकी हिनलबेल नामक बच्ची पोलियो से ग्रस्त है । पहले इस लड़की को ठीक करने के नाम पर चर्च ने इस गरीब परिवार पर डोरा डाला । लड़की न तो ठीक हुई न होनी थी बाद में मजदूरी करके जोड़े गये पैसे से जब उसने अपना छोटा सा मकान बनना शुरू किया तो राजू नामक पास्टर ने उसे धमकाया कि पहले ईसाई बनो फिर मकान बनने दूंगा । लोगों को पता लगने पर इस क्षेत्र में हंगामा हुआ ।

(गुजरात समाचार 18-1-99)

7. डांग में इस क्षेत्र के एक पास्टर जल्दूभाई और दूसरे जामनविहिर के पास्टर यशवंत भाई बताते है कि बीमारी और खराब आर्थिक स्थिति के कारण वे चर्च के चंगुल में फँस गये, उनके उपकार से बने होने के कारण वे ईसाई फादर की ईसाई बन जाने की मांग को ठुकरा नहीं सके ।

इन दोनो के साक्षात्कार इंडिया टुडे जनवरी 99 में भी छपे है । बाद में ये दोनो और कई अन्य पास्टर अपनी भूल और चर्च की ठगी को समझ कर पुन: अपने मूल धर्म में वापस आ गये ।

8. पीपलवाड़ा तालुका व्यारा जिला सुरत के नानूभाई दिवालूभाई कोंकणी चर्च और उसके ईशारे पर हो रहे अत्याचारों को याद कर आज भी अपनी हँसी भूल जाते हैं । 28 जनवरी 99 को पीपलवाड़ा में उसने बताया कि हम लोग जब पांडर देव की पूजा करते है तो हम पर गुलेलां से हमला और पीटायी होती थी । 17 वर्ष पूर्व शंकर भगवान के मंदिर पर नलिया डाल रहे थे तो ईसाइयों ने हम लोगों की बहुत पिटाई की । तब से मंदिर की मरम्मत करने की भी हम लोग हिम्मत नहीं करते थे । अब दो वर्ष से अम लोग जैसे नरक से मुक्त हुए है, 15 वर्ष बाद इस गांव में गणपति उत्सव मनाया गया है । स्वामी असीमानंदजी के इस क्षेत्र में आने और वनवासी कल्याण परिषद् के कार्यकर्ताओं के कारण ही हिन्दू समाज में फिर से बसंत आया है ।

9. डांग मे मंदिरो पर हमले और मूर्तियों को खंडित करने का क्रम अब भी जारी है । 19-20 जनवरी 99 की रात को पादलखड़ी के हनुमानजी के मंदिर में आग लगायी गयी । वहां गाय बैल का पूरा अस्थी पंजर डाला गया । मंदिर के प्रांगण में क्रास गाडा गया और मंदिर में लगे देवी देवताओं के फोटो में से 20-25 फाटो जलाये गये । 29-30 जनवरी 99 की रात को धुमकल के मंदिर में स्थापित शिवजी के लिंग को तोड़कर दो टुकड़े कर दिये गये ।

दोनों ही घटनाओं की प्राथमिकी दर्ज करने से पुलिस ने पहले तो आना कानी की फिर लोगों के दबाव को दखकर वाद तो दर्ज किया परन्तु नामजद रिपोर्ट होने के बावजूद अभी तक किसी को भी नहीं पकड़ा गया है। अवैध एवं अनैतिक रूप से चारेी छिपे बनाये गये कथिन प्रार्थनाघरों में से कुछ को जलाये जाने की निन्दनीय घटना को पूरी दुनिया में हिन्दू धर्म और देश की बदनामी के लिये प्रचारित किया गया परन्तु मंदिरों पर हुए, हो रहे हमले, मुर्तियों को खंडित करने, मरे हुए गाय बैल की हड्डियां डालकर मंदिरों को अपवित्र करने और संपूर्ण हिन्दू समाज को अपमानित करने की और न तो अंग्रेजी अखबार और न ही वोटों के सौदागर ध्यान दे रहे है ।

10. डांग और उसके आस पास रहते वाला अपना वनवासी समाज चर्च की समाज को तोड़ने वाली और राष्ट्रघाती प्रवृति को समझ चुका है । अज्ञान, लोभ और दबाव में आकर पुर्वजों के हिन्दू धर्म को छोडकर उसने गलती की है, यह महसूस कर अब वह अपने मूल धर्म में वापस आरहा है ताकि घर परिवार, गांव और संपूर्ण समाज में वह शांति से रह सके, अपनी अमूल्ल्य सांस्कृतिक धरोहर को बचा कर रख सके । इसके लिये उनई माता के पुराण प्रसिध्द गर्म पानी के कुंड में डुबकी लगा कर प्रायश्चित करके उनई माता, अंबा माता और भगवान राम के दर्शन करे सैकड़ो लोग प्रतिदिन अपने धर्म में वापस आरहे है ।

ऐसे वापस आरहे बंधुओं पर भी चर्च के ईशारे पर हमले हो रहे हैं । सुडीयाबरडा के लक्ष्मणभाई कनु भाई वाघमारे आयु 35 वर्ष ने 1/1/99 को आहवा पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया कि वह और उसका परिवार 5 वर्ष पूर्ण ईसाई हुआ था । 29/12/98 को अपपनी मर्जी से पुन: हिंन्दू बन गया है इसके कारण गांव के सावलू, गुलाब, चारसू बेन, सीताराम वगैरह 12 लोग एक राय होकर उसके घर पर हमला करने आये और मारपीट की ।

(गुजरात मित्र, नव गुजरात सूरत दिनांक 2/1/99)

11. डांग जिले से लगे हुए नवापुर तालुका जिला नंदूरबार के चिंचपाड़ा के ईरजी वासोवा पर तो इस सांस्कृतिक नवजागरण का इतना प्रभाव हुआ कि उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । लगभग 15-20 वर्ष पूर्व ईसाई बने हुए इस परिवार में ईरजी के पिताजी की एक वर्ष पूर्व मृत्यु हो गई थी । 5 जनवरी 99 को इस क्षेत्र में एक विशाल हिन्दू सम्मलेन हुआ था । इस सम्मेलन के बाद ईरजी को लगा कि अब वह वापस हिन्दू हो गया है । उसने अपने परिवार और समाज के प्रमुख लोगों को इकट्ठा किया और विचार किया कि अब क्या करना चाहिऐ । सब लोगों ने मिलकर निर्णय लिया और 17-1-99 को ईरजी और उसके समाज के लगभग 15 सौ लोगों ने मिलकर एक वर्ष पूर्व ईसाई रीति से दफनाये गये ईरजी के पिताजी का ताबूत निकाला और एक शव यात्रा के रूप में राम राम बोलते हुए उसके अवशेषों का पुन: हिन्दू रीति से अंतिम संस्कार किया ।

चर्च का षड़यंत्र उसी पर उल्टा पड़ा

1. डांग की स्वयं स्फुर्त घटनाओं के बाद चर्च ने प्रत्येक पिनकोड रखने वाले गांव में एक चर्च और प्रत्येक घर में एक बाईबिल पहुंचाने की अपनी योजना को पूरा करने के लिये इन घटनाओं को अपना प्रचार पाने का अच्छा अवसर बनाना चाहा । इसी समय उड़ीसा में आस्ट्रेलियाई पादरी को जीवित जलाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना हो गई । फिर तो उड़ीसा में ही नन पर कथिन बलात्कार, दो ईसाई युवक-युवतियों की हत्या की घटनायें और इन सब में राष्ट्रवादी शक्तियों पर आरोप लगाकर पूरी दुनिया में अपनी प्रचार व धन शक्ति के बल पर हड़कंप मचाने में चर्च और उसके पैरोकार सफल ही हो गए । परन्तु झूठ कब तक चल सकता था ? जैसे जैसे इन मामलों मे तेजी से जांच आगे बढ़ी और उसके निष्कर्ष प्रकट होने लगे तो यह भी स्पष्ट हो गया कि बलात्कार की घटना केवल एक ढोंग था । दोनों ईसाई युवक-युवतियों की हत्या में भी स्थानीक ईसाइयों का हाथ था । इससे पहले झाबुआ में हुई ननों के साथ शर्मनाक बहुप्रचारित हादसे में भी स्थानीक ईसाई अपराधियों का हाथ होना प्रकट हो गया था ।

2. यदि चर्च और उससे जुड़े संगठनो, उसके समर्थकों, निहित स्वार्थ वाले कथित सैक्युलर राजनीतिज्ञों की नीयत में खोट नही है तो वे प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के धर्मान्तरण पर राष्ट्रीय बहस के सवाल पर आनाकानी क्यों करते है ?

3. दिल्ली के आर्कविशप करम मसीही ने 5 जनवरी 99 को दिल्ली में संवादताता सम्मेलन में यह दावा किया था कि भारत में काई विदेशी मिशनरीज कार्यरत नहीं है, भारत सरकार किसी विदेशी को मिशनरी कार्य के लिए वीजा नही देती । उनके दावों की पोल कुछ ही दिनों में उड़ीसा में आस्ट्रेलियाई मिशनरी स्टेन्स और उसके दो पुत्रों की हत्या ने खोल दी कि भारत में विदेशी मिशनी हैं या नहीं । आज भी हजारों की संख्या में विदेशी मिशनी इस देश में कार्यरत है ।

(देखिये इंडियन एक्सप्रेस 6/1/99)

1857 की क्रांति को दबाने के लिए 15 हजार ईसाइयों पर ही अंग्रेजों का भरोसा था, इनके से कुछ तो मूलत: ईसाई थे और कुछ धर्मान्तरित ।

(1845 से छोटा नागपुर में ईसाई मिशन के सौ वर्ष-डाक्टर एस.महतो. पृष्ठ 54)

जो मनुष्य हिन्दू धर्म छोड़कर जाता है तो केवल हिन्दूओं की एक संख्या में कमी नहीं होती है बल्ल्कि शत्रु की संख्या में एक की वृध्दि भी होती है ।

यदि मेरे हाथ में सत्ता होती तो मैं धर्मान्तरण पर कानूनन रोक लगा देता - महात्मा गांधी

विशेष -

1. चर्च नें बहुत सोच विचार करके, हिन्दू समाज के लोगों को धोखे में रखने के लिए चर्च को देवल का नाम दिया । देवल-देवरा सामान्य रूप से हिन्दूओं के छोटे मंदिरों को कहते हैं । यह नाम इसलिए दिया गया ताकि ग्रामीण वनवासी इस भुलावे में आ जाये कि यह भी हमारे भगवान का ही एक मंदिर है ।

2. गुजरात में भी और अन्य स्थानों पर भी चर्च अपनी सोची समझी योजना के तहत धर्मान्तरित लोगों का नाम नहीं बदलता और जनगणना में भी ईसाई नहीं लिखवाते है । यही कारण है कि देश में ईसाईयों की अधिकृत आबादी 2.39 है परन्तु वास्तव में 4.5 (देखें ऑपरेशन वर्ल्ड-ओम पब्लिकेशनस पृष्ठ 274-275) । इसके कई कारणों में एक
है कि प्रशासन और उससे जुड़े तंत्र को और हिन्दू समाज की उनकी इस कुटिल चाल का तत्काल पता नहीं लगे । यदि चर्च धर्म परिवर्तन करना मूल अधिकारों में माता है तो उसे इस प्रकार चोरी से काम करने की क्या जरूरत है ?

फरवरी 22, 1999 विष्णुकांत

(डांग की तत्कालीन घटनाओं के बाद उस क्षेत्र में प्रवास और समाचार पत्रों के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट)

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