श्री शबरीधाम यात्रा माहात्म्य
सम्पूर्ण विश्व में अपनी पवित्र भारतभूमि को कर्मभूमि एवं मोक्षभूमि कहा गया है। जगत के अन्य देश अपनी अपनी भूमि को भोगभूमि मानते हैं। भूमि के प्रति भारत एवं अन्य देशों की सोच में यही महत्वपूर्ण अन्तर है। यह भारतभूमि अनेक ऋषि मुनियों की तपस्थली है। अनेक महापुरूषों की जन्मभूमि है। यहाँ का बच्चा बच्चा राम है, यहां का कंकर कंकर शंकर है। यहाँ तो स्वयं परमेश्वर को जन्म लेने की इच्छा होती है।
गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंन्धु जैसी अनेक नदियों ने इस भूमि को सिंचित किया है। यहाँ का जन जन नदी को माता कहता है। इन्हीं नदियों के तट पर यहाँ की सभ्यता विकसित हुई है। प्रतिदिन स्नान करते समय पानी को तीर्थ मानकर हम नदियों का स्मरण करते हुए कहते हैं.
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरू॥
कलियुग में श्रध्दावान लोग मन में ईश्वर प्राप्ति की इच्छा रखते हुए तीर्थयात्रा करते हैं। यह हमारी संस्कृति है। ज्ञान-विज्ञान-कला के माध्यम से साधना कर ईश्वर प्राप्ति करना भारत में अन्तिम उद्देश्य माना गया है। इसमें तीर्थयात्रा भी ईश्वर प्राप्ति का माध्यम माना है। सृष्टि के विविध रूपों का रसास्वादन कर केवल मनोरंजन प्राप्त करने तक तीर्थयात्रा सीमित नहीं है। ईश्वर के विविध रूपों के दर्शन का सात्त्विक प्रयास ही तीर्थयात्रा है।
तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते।
मानव जीवन के आधारभूत जीवनमूल्ल्य मानो हमारे जलस्त्रोत हैं। ऐसे अनेक जलस्त्रोतों में स्वयं परमेश्वर ने स्नान किया है। अपने विविध तीर्थस्थलों की पवित्रता से सभी मनुष्यों की काया, वाचा, मनसा, शुध्दि होती हैं। सभी श्रध्दालु तीर्थस्थलों में पवित्र स्नान कर भगवान का पूजन करते है। अपने पुरखों की मुक्ति की कामना कर, ऐहिक सुख प्राप्ति एवं आमिक उन्नति के लिए तीर्थयात्रा करना हिन्दू धमृशास्त्रों का आदेश है।
जम्बूद्वीप के भरतखंड में दंडकारण्य क्षेत्र प्रभु श्री रामचंद्रजी के पदस्पर्शों से पुनीत हुआ है। चित्रकूट में पर्वत, नाशिक में पंचवटी इत्यादि भारत में सुप्रसिध्द हैं। उसी प्रकार ऋषि मतंग एवं उनकी रामभक्त शिष्या माता शबरी की तपोभूमि अर्थात गुजरात राज्य के डांग जिले का वनक्षेत्र भी बहुत प्रसिध्द है। पंचवटी से दक्षिण पश्चिम में स्थित यह वनप्रदेश पुरातनकालीन दंडकारण्य है। डांग के जिला मुख्यालय आहवा में दंडकेश्वर महादेव मन्दिर उसकी गवाही देता है। इस प्रदेश के आसपास में निवास करनेवाले हिन्दू कोली एवं अन्य वनवासी समाज के मन में रामायण रचयिता वाल्ल्मीकि के प्रति बड़ी श्रध्दा है। स्थानीय भील एवं वनवासी बन्धुओं में मतंग ऋषि एवं माता शबरी के प्रति अनन्य श्रध्दाभाव है।
आहवा से 34 कि.मी. दूर सुबीर गाँव के पास चमक डोंगर नामक एक पहाड़ी है। दंडकारण्य में भ्रमण करते समय यहाँ राम लक्ष्मण की माता शबरी से भेट हुई थी, उसी स्थान पर एक छोटे से मन्दिर का निर्माण हुआ है जो शबरीधाम नाम से जाना जाता है। आसपास के सारे हिन्दुओं का वह एक तीर्थक्षेत्र है। लाखों श्रध्दावान यहाँ समस समय पर दर्शन हेतु आते हैं। माघ पूर्णिमा के दिन पुष्करिणी (पूर्णा) नदी के पम्पा सरोवर के पतंग तीर्थ में स्नान करने हेतु एकत्रित होने की परंपरा कई वर्षों से है।
डांग एवं आसपास के विस्तार में जनजागृति का कार्य करने वाले पूज्य स्वामी असीमानन्दजी की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए रामायण कथाकार पूज्य मोरारिबापू ने शबरीधाम में रामकथा पारायण किया। कथा के समय सहज भाव से उन्होंने कुम्भ का आव्हाहन किया। सभी ने उसका सहर्ष स्वागत किया। यह कुम्भ शबरीकुम्भ के नाम से प्रचलित होगा। स्वामी असीमानन्दजी के मार्गदर्शन में स्थानीय समिती ने एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया। यह मानो इस तीर्थ का जीर्णोध्दार हुआ।
शबरीकुम्भ के पूर्व कुम्भ स्थल पर ध्वजारोहण कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। करवीर पीठ के पूज्य शंकराचार्यजी के पवित्र करकमलों से ध्वजारोहण हुआ। इस अवसर पर एक धर्म परिषद का भी आयोजन हुआ।
गुरू जब तुला राशि में प्रवेश करता है, तब भाविक भक्तों के साथ संत महात्मा भी पवित्र स्नान करने हेतु इसी पम्पा सरोवर के मतंग तीर्थ में एकत्रित होते है। यहाँ पर मानो मेला लगता है, जो शबरीकुम्भ नाम से प्रचलित हुआ है। इस अवसर पर गुजरात शासन ने पम्मा सरोवर एवं शबरीधाम के आसपास के परिसर में उत्तम सुविधाएँ निर्माण की है। इन्हीं सुविधाओं के कारण लाखों की संख्या में भक्तगण इस शबरीकुम्भ के शुभ अवसर पर सहजरूप में एकत्र हो सकेंगे।
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